खोरठा साहित्य जगत के प्रख्यात कवि ‘सुकुमार’ का निधन, शोक की लहर
Bokaro:
खोरठा भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि एवं गायक सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ का शुक्रवार को निधन हो गया। वे लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। आर्थिक तंगी के कारण उनका इलाज अधूरा रह गया था। बताया जा रहा है कि वे सीएमसी वेल्लोर से इलाज कराकर लौट रहे थे, इसी दौरान ओडिशा के भुवनेश्वर में उन्होंने अंतिम सांस ली।
सुकुमार का जन्म 2 नवंबर 1956 को बोकारो जिले के नावाडीह थाना क्षेत्र अंतर्गत भेंडरा गांव में हुआ था। वे खोरठा भाषा के बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। उन्होंने कवि, नाटककार और कहानीकार के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। खोरठा साहित्य में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें ‘खोरठा कोकिल’ की उपाधि दी गई थी।
सम्मान और उपलब्धियां:
सुकुमार को वर्ष 1993 में बोकारो खोरठा कमेटी द्वारा ‘खोरठा रत्न’ से सम्मानित किया गया था। वर्ष 2006 में झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा द्वारा ‘अखड़ा सम्मान’ प्रदान किया गया। 2007 में झारखंड सरकार के युवा कला एवं खेल विभाग द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया। उसी वर्ष शोषित मुक्ति वाहिनी ने उन्हें ‘परमवीर अब्दुल हमीद सेवा सम्मान’ से नवाजा। वर्ष 2009 में उन्हें ‘झारखंड रत्न’ तथा 2017 में ‘बुलाल गोस्वामी कला सम्मान’ मिला। उनकी 12 से अधिक पुस्तकें झारखंड के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं, जो उनके साहित्यिक योगदान की महत्ता को दर्शाती हैं।
साहित्यिक योगदान:
सुकुमार ने वर्ष 1972 में भेंडरा हाई स्कूल से मैट्रिक तथा 1976 में धनबाद से आईटीआई की पढ़ाई पूरी की। उनकी चर्चित कृतियों में 31 कविताओं का संग्रह ‘एक मौनी फूल’ काफी लोकप्रिय रहा। इसके अलावा ‘डाह’ नाटक, जो मानवीय संबंधों और ईर्ष्या पर आधारित है, खोरठा साहित्य में अत्यंत प्रसिद्ध है। उन्होंने अनेक गीत, कविताएं और नाटक लिखकर झारखंड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना को मजबूत किया।
खोरठा भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि एवं गायक सुरेश कुमार विश्वकर्मा ‘सुकुमार’ का शुक्रवार को निधन हो गया। वे लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। आर्थिक तंगी के कारण उनका इलाज अधूरा रह गया था। बताया जा रहा है कि वे सीएमसी वेल्लोर से इलाज कराकर लौट रहे थे, इसी दौरान ओडिशा के भुवनेश्वर में उन्होंने अंतिम सांस ली।
सुकुमार का जन्म 2 नवंबर 1956 को बोकारो जिले के नावाडीह थाना क्षेत्र अंतर्गत भेंडरा गांव में हुआ था। वे खोरठा भाषा के बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। उन्होंने कवि, नाटककार और कहानीकार के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। खोरठा साहित्य में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें ‘खोरठा कोकिल’ की उपाधि दी गई थी।
सम्मान और उपलब्धियां:
सुकुमार को वर्ष 1993 में बोकारो खोरठा कमेटी द्वारा ‘खोरठा रत्न’ से सम्मानित किया गया था। वर्ष 2006 में झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा द्वारा ‘अखड़ा सम्मान’ प्रदान किया गया। 2007 में झारखंड सरकार के युवा कला एवं खेल विभाग द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया। उसी वर्ष शोषित मुक्ति वाहिनी ने उन्हें ‘परमवीर अब्दुल हमीद सेवा सम्मान’ से नवाजा। वर्ष 2009 में उन्हें ‘झारखंड रत्न’ तथा 2017 में ‘बुलाल गोस्वामी कला सम्मान’ मिला। उनकी 12 से अधिक पुस्तकें झारखंड के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं, जो उनके साहित्यिक योगदान की महत्ता को दर्शाती हैं।
साहित्यिक योगदान:
सुकुमार ने वर्ष 1972 में भेंडरा हाई स्कूल से मैट्रिक तथा 1976 में धनबाद से आईटीआई की पढ़ाई पूरी की। उनकी चर्चित कृतियों में 31 कविताओं का संग्रह ‘एक मौनी फूल’ काफी लोकप्रिय रहा। इसके अलावा ‘डाह’ नाटक, जो मानवीय संबंधों और ईर्ष्या पर आधारित है, खोरठा साहित्य में अत्यंत प्रसिद्ध है। उन्होंने अनेक गीत, कविताएं और नाटक लिखकर झारखंड की सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना को मजबूत किया।
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