पर्यावरण दिवस पर खोरठा कवि पंचम महतो की रचना परयाबरन गेले हे नासाय
Bokaro:
आज विश्व पर्यावरण दिवस पर खोरठा कवि की रचना ने दिल को झकझोर कर रख दिया। पंचम महतो बालीडीह क्षेत्र के विस्थापित है। करीब 70 वर्ष की उम्र में समाज को आईना दिखाने का दमखम रखते हैं। उनके द्वारा पर्यावरण पर लिखि गई खोरठा गीत लोगों को बहुत पसंद आ रही है।
पंचानन महतो की परयाबरन पर लिखी गई गीत…
कि कहब दुखेक काथा,
धरती मांयेक मनेक बेथा।
परयाबरन गेले हे नासाय,
एखन बांचा दाय,
भाई बहिन करा कुछ उपाय।।
काटाइ गेलो बोन झार,
फुराइ गेलो केंद पियार।
पसु पांखिक बांचा भेलो दाय,
एखन बांचा दाय,,
परयाबरन गेलै हो नासाय।
मेंजुर मइना तीतीरेक हुक,
कहां गेलक कोयलेक कुक।
खेरहा हरिनेक दरसन नांय,,
सोब गेल हथ पाराय,
परयाबरन,,,,,
झर हल झरना ़झर झर,
नदी नाला हर हर,
बांध कुंआ गेलो सोब सुखाय।
पानी पावा दाय,
परयाबरन,,,
नदीं फरिछ पानी कहां,
घीसट नाला बहे ताहां।
गंगाक पानी गेले हे नासाय
कहां पाप धोवाय,
परयाबरन,,,,
जेते बनल कइर कारखाना,
धुंगा उडे अनठेकाना।
ओजोन लेयर देलो फाटा
के करत रेहाइ,
परयाबरन,,,,
मुलुकें ऐते मानुस बाढल,
अन पानी हावा घटल।
पियेक पानी जा हो बुलाया,
भेलक बांचा दाय,
परयाबरन,,,
गाछपात लगवे हेतो,
हावा पानी बंचवे भेतो।
मिली मेसी करा साफाय,,,
एगो ऐहे उपाय,
परयाबरन,।।

